मन्त्री जी के फार्म हाउस में मेरी बीवी- 1

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रोड सेक्स हिंदी कहानी में पढ़ें कि मैं अपनी बीवी की चुदाई कर रहा था कि मन्त्री जी ने गाड़ी भेज कर मेरी बीवी को फार्म हाउस बुला लिया. मैंने बाइक से पीछा किया तो …

नमस्कार दोस्तो, मैं पैंतीस साल का स्वप्निल झा अपनी बीस साल की रंडी बन चुकी बीवी की चुदाई कहानी सुना रहा था.

आपको मैंने पिछली सेक्स कहानी
मेरी बीवी की ताबड़तोड़ चुदाई
में बताया था कि पुलिस अधिकारी गुरबचन जी अपने दो साथियों के साथ मेरी बीवी को चोदने मेरे घर आ गए थे.
उन्होंने मुझे घर से चले जाने की कह दिया था और वो तीनों मेरी बीवी की चूत गांड की प्यास बुझाने लगे थे.

अब आगे रोड सेक्स हिंदी कहानी:

उस दिन के घटना के बाद सात दिन तक न किसी का कॉल आया ना कोई खुद आया.

मैंने अरुणिमा को दो दिन आराम करने दिया और तीसरे दिन अरुणिमा अपनी ठरक के चलते खुद मुझे उकसाने लगी और हमने चुदाई कर ली.

वो मुझसे एक बार चुदने से ठंडी नहीं हुई थी और उसे अभी अपनी और चुदाई करवाने का मन था.
मैंने काफी देर तक उसकी चूत चाटी और कुछ कोशिश करके फिर से उसे चोदा मगर मैं जल्दी झड़ गया और उसने मुझसे फिर से अपनी चूत चटवा कर जैसे तैसे अपनी चूत का पानी निकलवा लिया.

अब हम दोनों सो गए.

फिर दिन में दो या तीन बार के हिसाब से अगले पांच दिन तक मैं उसकी चुदाई करता रहा.
अलग बात बस ये रही कि पहले मैं उसकी गांड नहीं मार पाता था, पर इन पांच दिनों में मैंने हर रोज उसकी गांड मारी थी.

वो भी कमोवेश कुछ ठंडी होने का अहसास करती थी मगर अब मेरे अकेले के लंड से उसकी चूत गांड की खुजली शांत नहीं होती थी.

आठवें दिन सुबह का नौ बज रहा था और मैं बरामदे में बैठ कर पेपर पढ़ रहा था.
अरुणिमा हमेशा की तरह नंगी ही थी और मेरी टांगों के बीच बैठ कर मेरा लंड चूस रही थी.

आज छुट्टी का दिन था तो किसी के आने की उम्मीद नहीं थी.
मैंने सामने के दरवाजे की कुण्डी नहीं लगाई थी और बेफिक्री से मैं लंड चुसाई का मजा ले रहा था.

जैसे ही मैं अरुणिमा के मुँह में झड़ा, मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई खड़ा है.
मैंने पेपर एक तरफ किया और अरुणिमा ने नजर उठा कर देखा.

उसकी आंखों में आश्चर्य के भाव थे, तो मैंने तुरंत उठ कर पीछे देखा.
पीछे एक आदमी खड़ा था, जो ड्राइवर की पोशाक पहने हुए था.

मैंने उसे देखा तो उसने कहा- मुझे विश्वेश्वर जी ने भेजा है. उन्होंने अरुणिमा जी को फार्महाउस पर बुलाया है. शाम तक मैं उनको वापस छोड़ दूंगा.
अरुणिमा खड़ी हुई ये जानते हुए कि वो नंगी है. उसने अपने हाथों से अपनी चूत और मम्मों को छुपाया.

वो उस ड्राइवर से बोली- बाहर रुको, मैं तैयार होकर आ रही हूँ.
ड्राइवर बोला- विश्वेश्वर जी ने कहा था कि मैडम नंगी ही होंगी और उनको उसी हालत में लाना है. आपको कपड़े पहनने की जरूरत नहीं है.

मैंने बात काटने को हुआ तो उसने कहा- और ये भी बोला है कि स्वप्निल जी को साथ में नहीं लाना है.
मैंने तुरंत विश्वेश्वर जी को कॉल किया तो वो बोले- हां तो अरुणिमा को चोदने को ही बुला रहा हूँ, नंगी आएगी तो क्या हो जाएगा. यहां आकर तो उसे नंगी होना ही है.

तब मैंने अपने आने का पूछा तो बोले- तू क्या करेगा आकर, मेरा लंड हाथ में पकड़ कर उसकी चूत में डालेगा क्या? तू घर पर ही रह, मैं शाम को उसको पहुंचवा दूंगा.

मैंने कभी सोचा नहीं था कि विश्वेश्वर जी और बाकी लोग अरुणिमा को अपनी रखैल समझने लगेंगे.

मैंने विश्वेश्वर जी से कहा- एक बार के लिए ठीक था लेकिन ये रुटीन बनाना ठीक नहीं है. अरुणिमा मेरी वाइफ है और उसको इस तरह से बार बार, आप मेरी बात समझ रहे हैं ना?

विश्वेश्वर जी बड़े आराम से बोले- हमारे रसूख से तुमने कितने दो नंबर के काम एक नंबर में करवाए हैं. एक दो बार का समझ आता कि चलो पहचान है तो हमारे रसूख का इस्तेमाल कर लिया. कभी कभी के लिए ठीक है. पर तुमने आदत बना ली थी. हर जगह हमारे नाम का इस्तेमाल करके अपना हर काम करवाया है. मैंने कभी बोला क्या कि स्वप्निल बस हो गया, अब हमारे नाम का इस्तेमाल मत करो.

मैं चुपचाप सुन रहा था.

वो थोड़ा रुक कर बोले- लेकिन मैं तेरी बात समझ गया. चलो जो हुआ सो हुआ, पुरानी बात को दफ़न करते हैं. जो काम करवा लिए और जिनका पेमेंट हो गया उसको भूल जाते. अब कोई पेमेंट रुका हुआ या काम चालू है, उसको मैं सब जगह फोन करके रुकवा देता हूँ. मैं ये नहीं बोल रहा कि काम उठाने या करने नहीं दूंगा. बिल्कुल करो, बस मेरे नाम से कोई नया काम नहीं मिलेगा. अपने सामर्थ्य पर काम करो, जैसा सब करते हैं.

मेरे बहुत ज्यादा बड़े दो तीन काम पेंडिंग चल रहे थे अभी. काम रुक जाना बड़े नुकसान का कारण बन सकता था और सच तो ये था कि बिना इन चारों के रसूख के मैं इस शहर में काम कर ही नहीं सकता था.

मैंने अपनी आवाज में नर्मी ला कर कहा- शाम को कितने बजे तक अरुणिमा को पहुंचवा देंगे आप?
विश्वेश्वर जी बोले- क्या बात है, बड़ी चिंता हो रही है. चार बजे तक छुड़वा दूंगा. ज्यादा लम्बा प्रोग्राम नहीं है.

मैंने ड्राइवर से कहा कि गाड़ी को बाउंड्री के अन्दर ले आए.

वो बाहर गया और महिंद्रा स्कार्पियो को अन्दर ले आया.
अरुणिमा नंगी ही बाहर निकली और चुपचाप पीछे की सीट पर बैठ गई.

स्कार्पियो तुरंत निकल गई और मैं अन्दर आ गया.
हालांकि विश्वेश्वर जी ने मुझे घर पर रहने को बोला था पर मेरा अरुणिमा को अकेले वहां छोड़ने का मन नहीं था.

मैंने पिछली बार देखा था कि मेरी अनुपस्थिति में लोग अरुणिमा को वहशी की तरह चोदते हैं.

तो मैं तैयार हुआ और घर को बंद करके बाइक से विश्वेश्वर जी के फार्महाउस के तरफ रवाना हुआ.

फार्महाउस शहर के बाहर सुनसान में स्थित है और लगभग चार किलोमीटर का रास्ता एकदम सुनसान था.

एक तो स्कार्पियो की गति बाइक की तुलना में ज्यादा ही होती है और दूसरा मुझे निकलते भी बीस मिनट से ऊपर हो गया था.

अरुणिमा अब तक पहुंच गई होगी और मैं क्या बहाना बनाऊंगा, ये सोच कर मैं थोड़ा धीरे धीरे ही ड्राइव कर रहा था.

अभी दो किलोमीटर सुनसाने में ड्राइव किया होगा, तो मुझे वही स्कार्पियो रोड से थोड़ा नीचे उतर कर मैदान में एक पेड़ के नीचे खड़ी दिखी.

स्कार्पियो पहचानने में गलती तो हो ही नहीं सकती थी क्योंकि विधायक का लाल बोर्ड स्कार्पियो के आगे लगा हुआ था, जो दूर से ही दिख रहा था.
अक्सर ड्राइवर मालिक को छोड़ कर ऐसे सुनसाने में गाड़ी खड़ी करके आराम करते हैं.

मुझे लगा कि ये ड्राइवर भी अरुणिमा को छोड़ कर आ गया होगा.
अब वहां की क्या परिस्थिति है, इस बात का अवलोकन और अनुमान लगाने के लिए मैंने ड्राइवर से पूछताछ करने का निर्णय लिया.

मैंने बाइक को उस ओर मोड़ दी और स्कार्पियो से कुछ दूर बाइक खड़ी कर दी.

स्कार्पियो की सारी खिड़कियां खुली हुई थीं, सो मैं टहलते हुए दरवाजे के पास पहुंचा.
जैसे ही मैंने अन्दर झांका, मुझे करंट सा लगा. मेरा चेहरा सीधे अरुणिमा के सामने था.
अरुणिमा बीच वाली सीट पर घोड़ी की तरह बनी थी और वो ड्राइवर उसको पीछे से चोद रहा था.

मुझे देख कर अरुणिमा ने नज़र झुका ली और ड्राइवर मुझे देख कर मुस्कुरा दिया.

दो चार धक्के लगाने के बाद उसने बोला- कमाल की टाइट चूत है रंडी की, मज़ा ही आ गया.
मुझे गुस्सा आ रहा था तो मैंने तुरंत विश्वेश्वर जी को कॉल करके उनको स्थिति से अवगत कराया.

विश्वेश्वर जी बोले- वजन करके देख ले. क्या अरुणिमा का पांच सौ ग्राम कम हो गया क्या?
मैंने कुछ जवाब नहीं दिया तो वो बोले- या फिर चूत दो इंच घिस कर छोटी हो गई या पतली हो गई?

मैंने फिर कोई जवाब नहीं दिया.
तो वो बोले- रंडी है अरुणिमा! बेचारे ड्राइवर को रंडियां जल्दी मिलती नहीं हैं, चोदने दे उसको. और तेरी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि वो मुझसे पूछ कर चोद रहा है.
मैं चुप था.

फिर उन्होंने मुझसे पूछा- तुझे तो घर पर ही रहने को बोला था ना, तू वहां क्या कर रहा है?
मैंने कहा कि क्योंकि अरुणिमा घर पर नहीं थी, तो मैं ऐसे ही तफरीह करने निकला था और मुझे आपके फार्महाउस के आगे एक पिकनिक स्पॉट पर जाना था.

उनको मेरी बात सही लगी तो कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी और फोन रख दिया.

मैं फ़ोन रख कर पलटा तो ड्राइवर अपना लंड अरुणिमा के चूत में खाली कर रहा था.

लंड खाली करके वो उठा और कपड़े लेकर बाहर निकल गया.
बाहर उसने कपड़े पहने और फिर ड्राइविंग सीट पर आ गया.

उसने गाड़ी को चालू किया और मेरे बगल से निकल गया.
अरुणिमा अन्दर एक कपड़े से अपनी चूत को साफ़ कर रही थी.

जब स्कार्पियो कुछ दूर निकल गई तो मैं धीरे धीरे फार्महाउस की तरफ बढ़ने लगा.
फार्महाउस पहुंचा तो बाइक धीरे कर दिया और गेट के सामने से निकला.

मैंने सर घुमा कर अन्दर झांका, तो मेरा शक सही निकला.

विश्वेश्वर जी ने अकेले चोदने के लिए अरुणिमा को फार्महाउस नहीं बुलवाया था.
अन्दर के गेट के ठीक सामने अरुणिमा घुटनों के बल बैठी थी और गुरबचन जी का लंड चूस रही थी.

उनके बगल में राजशेखर जी भी खड़े थे और अरुणिमा उनका लंड हाथ से सहला रही थी.
मैं बाइक लेकर आगे निकल गया और बाइक को एक सुनसान जगह पर खड़ा करके पैदल वापस आया.

मैं सावधानी पूर्वक गेट तक आया.
अन्दर झांका और देखा कि अब वहां कोई नहीं था.
सब शायद अन्दर जा चुके थे.

तो मैं अन्दर झांकने का तरीका सोचने लगा.
मैंने पूरे फार्महाउस का एक चक्कर लगाया और जब मैं गेट पर वापस पहुंचा तो वहां ड्राइवर खड़ा था.

उसको देख कर मैं हड़बड़ा गया.
उसने मुझसे कहा- साहब, अन्दर बुला रहे हैं.

मैं धड़कते दिल के साथ अन्दर गया और हॉल में कदम रखा.
हॉल में विश्वेश्वर जी, राजशेखर जी और गुरबचन जी के अलावा तीन और लोग बैठे थे.

सब नंगे बैठे थे और मैं सोच रहा था कि ये सबके सब अगर अरुणिमा को दो दो बार भी चोदेंगे तो वो पक्का बेहोश हो जाएगी.
गुरबचन जी मेरे पास आए और मुस्कुरा दिए.
मैं भी मुस्कुराया.

उन्होंने खींच कर मेरे चूतड़ों पर एक थप्पड़ लगाया और बोले- मना किया था न भोसड़ी के … फिर क्यों आया?

मुझे कुछ बोलते नहीं बना तो राजशेखर जी बोले- छोड़ ना, आ ही गया है तो इसको यहीं रहने दे.
फिर मुझे देख कर बोले- हमारे मजे में गांड पंगे ना करना, ठीक है!

मैंने सर हिला दिया और मुझे बैठने के लिए कह दिया गया.
मैं एक कुर्सी पर बैठ गया.

थोड़ी देर बाद अरुणिमा ट्रे लेकर कमरे में मुस्कुराती हुई आई.

उम्मीद के अनुसार बिल्कुल नंगी ही थी और हाथ में ट्रे थी, जिसमें शराब और चखना आदि सामान रखा था.
वो चल कर कमरे में मौजूद हर आदमी के पास जाती और वो लोग अपना अपना गिलास उठा लेते. साथ में या तो उसकी चूत में उंगली कर देते या उसकी जांघों को सहला कर मसल देते या उसके मम्मों को मसल देते, उसकी गांड में उंगली कर देते.

अरुणिमा हंस कर उन्ह आंह कर देती.

जब शराब पूरी बांट दी गई तो लोग अपना अपना गिलास पीने लगे.

एक गिलास ख़त्म हुआ तो अरुणिमा बोतल लेकर सबको परोसने लगी.

इस बार भी लोग उसके बदन से खेलते रहे.
शराब के दो तीन दौर के बाद विश्वेश्वर जी ने और शराब परोसने से मना कर दिया और अरुणिमा अन्दर चली गई.

उसके जाने के बाद सब लोग आपस में किसी टॉपिक पर बात करने लगे.
मुझे उन सबकी कोई बात समझ नहीं आ रही थी तो मैं उठा और अन्दर चला गया.

मैं अरुणिमा से मिलना चाहता था.
अन्दर उसको ढूंढता हुआ मैं किचन में पहुंचा.

किचन में अरुणिमा अकेली नहीं थी, जो लोग शराब पी रहे थे, उनमें से एक नजर बचा कर या विश्वेश्वर जी की मर्जी से अन्दर था.

अरुणिमा किचन में खड़ी थी और वो उसको पीछे से चोद रहा था.
अब वो आदमी अरुणिमा की गांड मार रहा था या चूत ये कह पाना मुश्किल है क्योंकि अरुणिमा का चेहरा मेरी तरफ था.

चोदने वाला अपना संतुलन बनाये रखने के लिए वो अरुणिमा के मम्मों पर अपने दोनों हथेली रखे हुए था.
अब कितना संतुलन बन रहा था मुझे नहीं पता, पर वो चुदाई के साथ साथ बहुत जोर जोर से अरुणिमा के मम्मों को मसल रहा था.

मुझे अन्दर आए दस मिनट हुए थे और वो आदमी शायद दस मिनट पहले अन्दर आया था.

उसकी शकल बता रही थी कि वो चरम पर पहुंच गया था और अरुणिमा के अन्दर झड़ने लगा.

फिर उसने अपना लंड बाहर खींचा और अपना पैंट ऊपर चढ़ा कर बाहर चला गया.

अरुणिमा वाशबेसिन तक गई और गीले कपड़े से खुद को साफ़ करने लगी.

अभी मैं उससे बात करने ही वाला था कि एक दूसरा आदमी आया और उसकी कमर में हाथ डाल कर उसको बाहर ले गया.
इससे पहले कि मैं उनका पीछा करता, वो दोनों पता नहीं किधर से मुड़े कि मैं उन्हें ढूंढ ही नहीं पाया.

पूरे फार्महाउस में भटकते भटकते आखिर बीस मिनट के बाद मैंने अरुणिमा को देखा.
वो दोनों फार्महाउस के पीछे की तरफ थे.

जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि वो आदमी अरुणिमा की छाती दीवार से सटा कर अरुणिमा को अपने और दीवार के बीच पीसते हुए उसकी गांड मार रहा था.

वो धक्के भी काफी ज़ोर से लगा रहा था जिससे अरुणिमा कराह रही थी मगर उसके चेहरे पर दर्द की शिकन भी नहीं थी.
इससे साफ़ मालूम पड़ रहा था कि वो अपनी निम्फो वाली समस्या से जूझ रही है.

जब तक मैं वहां पहुंचा वो अरुणिमा की गांड में झड़ने लगा.
मेरे पहुंचते ही उसने अपना लंड बाहर निकाला और पैंट ऊपर चढ़ा कर चलते बना.

अरुणिमा भी उसके पीछे पीछे चल दी और किचन में जाकर खुद को साफ़ करने लगी.

अभी वो सफाई करके मुड़ी ही थी कि तीसरा आदमी अपनी लंड की प्यास बुझाने हाजिर था.

उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया.

फिर अरुणिमा के कंधे पर थपथपाया.
अरुणिमा ने मुड़ कर उसे देखा तो उसने उसको किचन स्लैब पर ही झुकने को कहा.
अरुणिमा यंत्रवत झुक गई.

उसने अरुणिमा के चूतड़ों को फैलाया और उसकी गांड में अपना लंड घुसेड़ना शुरू कर दिया.
इसका भी लंड गुरबचन जी की तरह लम्बा और मोटा था और अरुणिमा को गांड मराने में परेशानी हो रही थी.

उसने जरा सा चेहरा घुमा कर कहा- सब गांड मारने के लिए ही क्यों मरे जाते हो, चूत चोदने का रिवाज खत्म हो गया है क्या?

उस आदमी ने आव देखा न ताव एक झटका दिया और लंड सरसरा कर अन्दर चला गया.
अरुणिमा घुटी घुटी सी चीख मार दी और बेचैनी से स्लैब पर मुठ्ठी मारने लगी.

थोड़ी देर बाद जब उसकी सांस में सांस आई तो वो आदमी गांड में लंड पेलता हुआ अरुणिमा से बोला- चूत प्रेमिका और बीवी की चोदी जाती है, यही रिवाज है. हमारे यहां तो रंडियों की सिर्फ गांड मारने का रिवाज है.
ये बोल कर वो उसकी गांड चोदने लगा.

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